भारतीय ऋषियों की अनूठी देन
पितृ-पक्ष
'आश्विन' या 'क्वार' मास का पहला कृष्ण पक्ष 'पितृ-पक्ष' के नाम से प्रख्यात है। वर्ष के इन पन्द्रह दिनों में अन्य किसी भी देवता की पूजा या यज्ञोपवीत, विवाह आदि शुभ कार्य करने का निषेध किया गया है, केवल 'पितरों' के ही स्मरण और तर्पण का विधान है। भारतीय ऋषियों की यह व्यवस्था उनकी अपूर्व दूर-दर्शिता का एक निराला उदाहरण है। सारे संसार में पूर्वजों की पुण्य स्मृति को सुरक्षित रखने की ऐसी सटीक परम्परा मिलनी दुर्लभ है।
आधुनिक युग में प्राचीन संस्कृति, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक सुख-शान्ति की सुरक्षा की आवश्यकता कितनी तीव्रता से अनुभव की जा रही है, यह प्रत्यक्ष ही है। इन सभी को 'पितृ-पक्ष' की भावना से बल मिलता है।
'पितृ-पक्ष' में १५ दिनों तक प्रति-दिन पितरों का तर्पण जो किया जाता है, वह है क्या? थोड़ा ही ध्यान देने से उसके महत्त्व का अनुभव किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने 'स्वर्गीय पिता, पितामह (पिता के पिता अर्थात् बाबा या दादा), प्रपितामह (बाबा या दादा के पिता) और स्वर्गीय मातामह (नाना), प्रमातामह (नाना के पिता) और वृद्ध प्रमातामह (नाना के बाबा या दादा) आदि के नामों का उच्चारण कर उनके प्रति जलाञ्जलि देनी होती है। साथ ही इन सभी पूर्वजों की धर्म-पत्नियों के भी नामों का उच्चारण कर उन्हें भी जलाञ्जलि अर्पित करनी होती है अर्थात् एक ओर अपनी 'स्वर्गीया माता, पितामही (दादी) और प्रपितामही (दादा की माता) आदि को, तो दूसरी ओर अपनी स्वर्गीया मातामही (नानी), प्रमातामही (नाना की माता) और वृद्ध-प्रमातामही (नाना की दादी) का स्मरण कर उन्हें जल से तृप्त करना होता है।
इस प्रकार 'दो परिवारों की तीन पीढ़ियों' के दम्पत्तियों का सादर स्मरण करने से उन 'परिवारों के इतिहास' की स्मृति सहज ही जागृत होती है और उससे अनूठी प्रेरणा मिलती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि उक्त नामोच्चारण कोरा नहीं किया जाता, नामों के साथ उनके 'गोत्र' का भी नामोच्चारण किया जाता है। 'गोत्र' अर्थात् उस ऋषि का नाम, जिससे उस परिवार का प्रचलन हुआ है।
उक्त पद्धति के अनुसार विचार करें- यदि किसी व्यक्ति के पुत्र हैं, तो अपनी और अपनी माता की तीन पीढ़ियों का स्मरण करेंगे अर्थात् उस व्यक्ति को अपने निजी परिवार, अपनी माता के परिवार और पुत्र के माध्यम से अपनी पत्नी के परिवार-तीन परिवारों का इतिहास स्मरणीय बना रहेगा। संस्कृति, इतिहास और परम्परा को सुरक्षित रखने का यह कितना अचूक विधान है।
यही नहीं, जिन परिवारों के पूर्वजों का स्मरण इस प्रकार श्रद्धा-पूर्वक किया जाता रहेगा, उनके वर्तमान वंशजों में प्रीति-भाव की वृद्धि सहज ही होती रहेगी। इसमें विविध परिवारों में सद्-भाव स्थापित होने से पूरे समाज में एकता की भावना विकसित होगी, जो प्रसारित होकर सारे देश-वासियों को एक सूत्र में आबद्ध कर सकेगी।
आज-कल 'पितृ-यज्ञ' की उक्त भावना का लोप हो जाने के कारण ही पति-पत्नी, पिता-पुत्र में मनो-मालिन्य की वृद्धि हो रही है। यदि परिवार में अपने सम्बन्धियों का स्मरण प्रति-दिन श्रद्धा से होता रहे, तो पारस्परिक सद्-भाव में कमी आ ही नहीं सकती। यह तथ्य एक साधारण पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी समझ सकता है।
'सरस्वती-सम्पादक' पण्डित देवीदत्त शुक्ल ने लगभग ५० वर्ष पूर्व लिखित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'हिन्दुओं की पोथी' में 'पितृ-यज्ञ' की जो विधि लिखी है, उससे स्पष्ट है कि पितरों की यह पूजा कितनी सरल और सस्ती है। पितरों की पूजा की सामग्री में 'कुशा' नामक घास, तिल, जौ, अक्षत, फूल और तुलसी की पत्तियाँ तथा शुद्ध जल जैसी वस्तुएँ हैं, जिनमें किसी को कोई विशेष खर्च नहीं करना है।
'पूजा की विधि' भी सर्वथा सहज है, केवल नामों का उच्चारण करना है और जल छोड़ना है। सारी विधि सम्पन्न करने में अधिक-से-अधिक १५ मिनट का समय लगता है। इतने अल्प समय में न केवल पूरे समाज का इतिहास अपने ध्यान में आ जाता है, अपितु प्रमुख देवताओं और ऋषियों के नाम भी कण्ठस्थ हो जाते हैं क्योंकि 'पितृ-यज्ञ' के अङ्ग-रूप में 'ब्रह्मा-विष्णु-महेशादि देवताओं और सप्तर्षि आदि ऋषियों' को भी जलाञ्जलि दी जाती है।
'पितृ-यज्ञ' शब्द ऋग्-वेद (१०।१६।१०) में आया है। यह तीन प्रकार से सम्पादित होता है—
१. तर्पण द्वारा (मनु ३।७० एवं २८३),
२. बलि द्वारा (मनु ३।९१) एवं
३. प्रति-दिन श्राद्ध द्वारा (मनु ३।८२-८३)।
'मनु' (२।१७६) के मत से प्रति-दिन देवों, ऋषियों एवं पितरों को तर्पण करना चाहिए अर्थात् जल देकर उन्हें परितुष्ट करना चाहिए।..." उक्त उद्धरण से यह प्रमाणित होता है कि 'पितृ-पक्ष' में पितरों के 'पूजन-तर्पण का विधान' कितना प्राचीन है—'वैदिक काल' से इसकी परम्परा चली आ रही है।
'पितृ-पक्ष' के १५ दिनों की अवधि में माता और पिता दोनों पक्षों के दिवङ्गत पूर्वजों का स्मरण करते समय हमें यह भी जानना चाहिए कि पूजनीय पितरों के लिए भारतीय ऋषियों ने 'पितृ-लोक' की भी अनूठी कल्पना की है। यह 'पितृ-लोक' अन्य देव-लोकों—विष्णु-लोक, शिव-लोक, ब्रह्म-लोकादि से भी उच्च माना गया है। 'पितृ-लोक' में पहुँचनेवाली आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता, जबकि अन्य लोकों में पहुँचनेवाली आत्माओं को पुण्य-भोग के बाद पुनः जन्म लेना पड़ता है।
'पितरों' की एक महती विशेषता और है। वह यह कि पितृ-देव व्यक्तियों के अपने निजी पूर्वज या सम्बन्धी ही होते हैं। अतः वे शीघ्र ही प्रसन्न होकर 'श्राद्ध' या 'तर्पण' करनेवाले व्यक्ति का सब प्रकार से कल्याण करते हैं, जबकि अन्य देवी-देवताओं-अवतारारदि इतनी सरलता से प्रसन्न नहीं होते। उनके पूजा-पाठ में अधिक परिश्रम और अनेक व्यय-साध्य अनुष्ठानों के चक्कर में पड़ना पड़ता है। ऐसी दशा में दयालु ऋषियों की इस अपूर्व देन—'पितृ-पक्ष' से हमें अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिए। श्रद्धा-पूर्वक पितरों का पूजन-तर्पण कर सब प्रकार से अपना अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करना चाहिए।
पूजन - सामग्री
- त्रि-कुश: तीन कुशों को एक साथ बाँध लेना।
- मोटक: तीन कुशों को बँट कर रस्सी की तरह बनाना।
- पवित्री: तीन कुशों को बँटकर दोहरी करके सिरे पर गाँठ देना और अंगूठी की तरह अनामिकाओं में पहनना।
- तिल
- यव ( जौ )
- अक्षत
- पुष्प
- चन्दन
- तुलसी-दल।
- नया यज्ञोपवीत
- स्वच्छ-धोती अँगोछा।
देव, ऋषि, दिव्य पितृ, यम एवं स्व-पितृ का तर्पण
१. शिखा-बन्धन
गायत्री-मन्त्र जप करता हुआ शिखा बाँधे।
२. तिलक
मस्तक पर चन्दनादि का तिलक लगावे।
३. प्राणायाम
प्रणव (ॐ) से पूरक, कुम्भक, रेचक : तीन बार करे।
४. आचमन
दाहने हाथ में जल लेकर, निम्न मन्त्र पढ़कर तीन बार आचमन करे—
१ ॐ केशवाय नमः।
२ ॐ माधवाय नमः।
३ ॐ नारायणाय नमः।
५. सङ्कल्प
दाहने हाथ में कुश, यव और अक्षत तथा जल लेकर 'सङ्कल्प' करे। यथा—
ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः तत्सत्। अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय-प्रहरार्द्धे श्रीश्वेत-वाराह-कल्पे जम्बु-द्वीपे भरत-खण्डे आर्यावर्तैक-देशान्तर्गते पुण्य- क्षेत्रे कलि-युगे कलि-प्रथम-चरणे अमुक-नाम संवत्सरे 'आश्विन' मासे 'कृष्ण'-पक्षे अमुक-तिथौ अमुक-वासरे अमुक-गोत्रोत्पन्नो अमुक-शर्माऽहं (वर्माऽहं, गुप्तोऽहं, दासोऽहं वा) देवर्षि-पितृ-तर्पणं करिष्ये।
उक्त पढ़कर जल-सहित अक्षतादि पात्र में छोड़ दे।
६. विश्वे-देवों का आवाहन
पहले सामने के पात्र में चन्दन, जौ, अक्षत, पुष्प और तुलसी-दल छोड़े। फिर उसमें तीन कुशों को रखे। अब उस पात्र में जल छोड़ता हुआ मन्त्र पढ़कर विश्वेदेवों का आवाहन करे। यथा—
ॐ विश्वेदेवान् आवाहयिष्ये। ॐ आवाहय।
ॐ विश्वेदेवास आगत शृणुता म इम-ग्वम् हवम्। इदं बर्हिर्निषीदत। ॐ ब्रह्मादयो विश्वेदेवा अत्रागच्छत। ॐ विश्वेदेवाः शृणुते म-ग्वम् हवं मे ये अन्तरिक्षे य उपद्यविष्ठ। ये अग्नि-जिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्।
७. देव-तर्पण
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्। ॐ विष्णुः तृप्यताम्। ॐ रुद्रः तृप्यताम्। ॐ प्रजापतिः तृप्यताम्। ॐ देवाः तृप्यन्ताम्। ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। ॐ वेदाः तृप्यन्ताम्। ॐ ऋषयः तृप्यन्ताम्। ॐ पुराणाचार्याः तृप्यन्ताम्। ॐ गन्धर्वाः तृप्यन्ताम्। ॐ इतराचार्याः तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सरः सावयवः तृप्यन्ताम्। ॐ देव्यः तृप्यन्ताम्। ॐ अप्सरसः तृप्यन्ताम्। ॐ देवानुगाः तृप्यन्ताम्। ॐ नागाः तृप्यन्ताम्। ॐ सागराः तृप्यन्ताम्। ॐ पर्वताः तृप्यन्ताम्। ॐ सरितः तृप्यन्ताम्। ॐ मनुष्याः तृप्यन्ताम्। ॐ यक्षाः तृप्यन्ताम्। ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचाः तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णाः तृप्यन्ताम्। ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। ॐ पशवः तृप्यन्ताम्। ॐ वनस्पतयः तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयः तृप्यन्ताम्। ॐ भूत-ग्रामश्चतुर्विधाः तृप्यन्ताम्।
८. ऋषियों का आवाहन
पहले यज्ञोपवीत (जनेऊ) और उत्तरीय (गमछे) को गले में कण्ठी के समान पहन ले। उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठे। हाथ में 'कुश' और 'यव' (जौ) लेकर दो-दो अँजुली जल देकर पूर्व-वत् आवाहन-पूर्वक तर्पण करे। यथा—
ॐ सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम्। सप्तापः स्वपतो लोकमीयुः तत्र जाग्रतो अ-स्वप्नजौ सत्र-सदौ च देवौ। ॐ सनकाद्याः सप्त ऋषयः अत्रागच्छत।
९. ऋषि-तर्पण
ॐ सनकः तृप्यताम्। ॐ सनन्दनः तृप्यताम्।
ॐ सनातनः तृप्यताम्। ॐ कपिलः तृप्यताम्।
ॐ आसुरिः तृप्यताम्। ॐ वोढुः तृप्यताम्। ॐ पञ्च-शिखः तृप्यताम्।
१०. दिव्य पितृ आवाहन
पहले 'अपसव्य' हो जाए अर्थात् यज्ञोपवीत और गमछा दाहने कन्धे पर कर ले। फिर हाथ में 'मोटक, तिल' और 'जल' लेकर तीन-तीन अञ्जलि जल देकर पूर्व-वत् आवाहन-पूर्वक तर्पण करे। यथा—
ॐ आयान्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देव-यानैः। अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तो अधि-ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्। ॐ कव्य-वाड़नलादयो दिव्य पितरः अत्रागच्छत।
११. दिव्य पितृ तर्पण
ॐ कव्य-वाड़नलः तृप्यतां इदं तिलोदकं स्वधा नमः। ॐ सोमः तृप्यतां इदं तिलोदकं स्वधा नमः। ॐ यमः तृप्यतां इदं तिलोदकं स्वधा नमः। ॐ अर्यमा तृप्यतां इदं तिलोदकं स्वधा नमः। ॐ अग्निष्वात्ताः तृप्यन्तां इदं तिलोदकं जलं तेभ्यः स्वधा नमः। ॐ सोमपाः तृप्यन्तां इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः। ॐ बर्हिषदः पितरः तृप्यन्तां इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।
१२. चौदह यम-आवाहन
पहले बाँएँ घुटने को जाँघ के नीचे दबाकर 'दक्षिण-मुख' होकर बैठे। फिर 'अपसव्य' रहते हुए तीन अञ्जलि जल 'कुश' और 'तिल' के साथ चौदह यमों को दे। पहले आवाहन करे। यथा—
ॐ यमादि-चतुर्दश-देवा आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्।
१३. यमादि का तर्पण
ॐ यमाय नमः। ॐ धर्मराजाय नमः। ॐ मृत्यवे नमः। ॐ अन्तकाय नमः। ॐ वैवस्वताय नमः। ॐ कालाय नमः। ॐ सर्व-भूत-क्षयाय नमः। ॐ औदुम्बराय नमः। ॐ दध्नाय नमः। ॐ नीलाय नमः। ॐ परमेष्ठिने नमः। ॐ वृकोदराय नमः। ॐ चित्राय नमः। ॐ चित्रगुप्ताय नमः।
१४. अपने पितरों का आवाहन
'मोटक, कुश' और 'तिल' से ऊपर की ही तरह जल प्रदान करे। पहले आवाहन करे। यथा—
ॐ पितॄन् आवाहयिष्ये, आवाहय।
१५. अपने पितरों का तर्पण
१. पिता—ॐ...गोत्रः अस्मत् पिता......वसु-स्वरुपः तृप्यतां इदं जलं तस्मै स्वधा नमः।
२. दादा—ॐ...गोत्रः अस्मत् पितामह......रुद्र-स्वरुपः तृप्यतां इदं जलं तस्मै स्वधा नमः।
३. परदादा—ॐ...गोत्रः अस्मत् प्रपितामह......आदित्य-स्वरूपः तृप्यतां इदं जलं तस्मै स्वधा नमः।
४. माता—ॐ...गोत्रा अस्मत् माता......गायत्री-रुपा तृप्यतां इदं जलं तस्यै स्वधा नमः।
५. दादी—ॐ...गोत्रा अस्मत् पितामही......सावित्री-रुपा तृप्यतां इदं जलं तस्यै स्वधा नमः।
६. परदादी—ॐ...गोत्रा अस्मत् प्रपितामही......सरस्वती-रुपा तृप्यतां इदं जलं तस्यै स्वधा नमः।
७. नाना—ॐ...गोत्रः अस्मत् मातामहो......वसु-स्वरुपः सपत्नीकः तृप्यतां इदं जलं तस्मै स्वधा नमः।
८. परनाना—ॐ...गोत्रो अस्मत् प्रमातामहो......रुद्र-स्वरूपः सपत्नीकः तृप्यतां इदं जलं तस्मै स्वधा नमः।
९. वृद्ध परनाना— ॐ...गोत्रो अस्मत् वृद्ध-प्रमातामहो......आदित्य-स्वरूपः सपत्नीकः तृप्यतां इदं जलं तस्मै स्वधा नमः।
१६. (क) अन्य सम्बन्धियों का तर्पण
एक-एक अञ्जलि निम्न मन्त्र से प्रदान करे—
ॐ आब्रह्म-स्तम्ब-पर्यन्तं, देवर्षि-पितृ-मानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे, मातृ-माता-महादयः।।
ॐ अतीत-कुल-कोटीनां, सप्त-द्वीप-निवासिनाम्।
मया दत्तेन तोयेन, तृप्यन्तु भुवन-त्रयम्।।
ॐ ये बान्धवा अबान्धवा वा, येऽन्य-जन्मनि बान्धवाः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु, मद्-दत्तेनाम्बुना सदा।।
( ख ) अपुत्र-अपुत्रियों का तर्पण
अँगौछे की चार तह कर भिगोवे और उसे निचोड़कर निम्न मन्त्र से जल दे—
ॐ ये चास्माकं कुले जाता, अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते तृप्यन्तु मया दत्तं, वस्त्र-निष्पीड़नोदकम्।।
( ग ) भीष्म-पितामह का तर्पण
सव्य होकर अर्थात् यज्ञोपवीत और अँगोछे को बाँएँ कन्धे पर करे और तब जल दे—
ॐ वैयाघ्र-पद-गोत्राय, सांकृति-प्रवराय च।
अपुत्राय ददाम्येतद्, सलिलं भीष्म-वर्मणे।।
१७. भगवान् सूर्य को अर्घ्य
अब दाहिने हाथ में 'जल, चन्दन, पुष्प' लेकर सूर्य भगवान् को अर्घ्य दे—
ॐ एहि सूर्य! सहस्रांशो, तेजो-राशे जगत्-पते!।
अनुकम्पय मां भक्त्या, गृहाणार्घ्यं दिवाकर!।।
१८. दिक्-पालों को नमस्कार
जल दे चुकने पर हाथ जोड़कर दिक्-पालों को नमस्कार करे। यथा—
ॐ इन्द्राय नमः—पूर्व दिशा
ॐ यमाय नमः—दक्षिण दिशा
ॐ वरुणाय नमः—पश्चिम दिशा
ॐ सोमाय नमः—उत्तर दिशा
ॐ ब्रह्मणे नमः—ऊपर दिशा
ॐ अग्नये नमः—आग्नेय दिशा
ॐ निर्ऋतये नमः—नैऋत्य दिशा
ॐ वायवे नमः—वायव्य दिशा
ॐ ईशानाय नमः—ईशान दिशा
ॐ अनन्ताय नमः—अधः दिशा
जल के मध्य में—
ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ अग्नये नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ ओषधिभ्यो नमः, ॐ वाचे नमः, ॐ वाचस्पतये नमः, ॐ महद्भयो नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ वरुणाय नमः।
१९. विसर्जन
पुष्पाक्षत सहित हाथ जोड़कर, निम्न मन्त्र पढ़कर सब देवताओं को विदा करे—
ॐ देवा! गातु-विदो गातुं वित्त्वा मातुमित।
मनसस्पत इमं देव! यज्ञ स्वाहा वाते धाः।।
२०. समर्पण
पुष्पाक्षत सहित हाथ जोड़कर, अपने सम्पूर्ण पूजा-कर्म को अर्पित करे—
अनेन यथा-शक्ति-कृतेन देव-ऋषि-पितृ-तर्पणाख्येन कर्मणा भगवान् मम समस्त-पितृ-स्वरूपी जनार्दन वासुदेवः प्रीयतां न मम।। ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु।।